हरियाणा में बीजेपी का 75 पार का खेल बिगाड़ सकता है जाटलैंड। EXCLUSIVE REPORT।

 NEWS DESK (COBRA TELEVISION)
बीजेपी का 75 पार का खेल बिगाड़ सकता है जाटलैंड

अक्टूबर में हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने संभावित है, बीजेपी अपने चरम पर है और मोदी-अमित शाह के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनीं। आपको बता दे की पिछली लोकसभा चुनाव में मोदी की सुनामी में सभी पार्टिया धराशाही हो गई थी, इसके थोड़े दिन बाद ही हरियाणा में विधानसभा चुनाव हुए जिसमे भी मोदी फैक्टर ने अपना काम किया और हरियाणा में खटटर सरकार बनी। अगर एक नज़र हम वर्ष 2014 में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम के मैप पर डाले तो बीजेपी को जाटलैंड में करारी हार का सामना करना पड़ा था।

हरियाणा में 90 विधानसभा सीटों के लिए वर्ष 2014 में हुए चुनाव परिणाम पर गौर करे तो बीजेपी ने 47 सीटों से बहुमत पाया था और कुछ निर्दलीय विधायकों ने भी बीजेपी को सपोर्ट किया था जिसके दम पर बीजेपी ने अपनी सरकार बना ली थी, लेकिन अब की बार जो बीजेपी का सपना 75 पार का है उसका खेल जाटलैंड बिगाड़ सकता है। यहां आपको बता दे की वर्ष 2009 में बीजेपी को सिर्फ 4 सीटों से ही गुजारा करना पड़ा था वहीं इनलो को 31 तो कांग्रेस को 40 सीट ही मिल पाई थी, लेकिन हजका के कुछ विधायक टूटे और कांग्रेस में चले गए जिसके बाद कांग्रेस ने अपनी सरकार बनाई। अगर बात हम 2014 विधानसभा चुनाव की करे तो मोदी फेक्टर ने अपना काम किया और हरियाणा में बीजेपी सत्ता पर काबिज हुई। अब आपको बताते है बीजेपी को वर्ष 2014 के चुनाव में 47 सीटों से संतोष करना पड़ा, वही इनलो 19 व कांग्रेस को 15 सीटों से संतोष करना पड़ा और विपक्षी दल के रूप में इनलो को विधानसभा में जगह मिली।

लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद राजनैतिक पहलवानी का खेल शुरू हो गया, कर्नाटक उसका ताजा उदाहरण है। लेकिन बीजेपी पिछले चुनाव परिणाम को भूल जाती है। पिछली बार सभी पार्टिया मोदी की सुनामी में ऐसी बही की अधिकतर पार्टियों का सूपड़ा ही साफ़ हो गया। सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस की हालत तो यह हुई की राजधानी के 150 किलोमीटर के दायरे में केवल एक ही सांसद चुन कर आया।

जब से हरियाणा प्रदेश बना है जाट राजनीति का हरियाणा प्रदेश पर विशेष प्रभाव रहा है। उसी वंश को आगे बढ़ाते हुए इनलो से ओमप्रकाश चौटाला और भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने प्रदेश का नेतृत्व किया है और आज भी उनकी प्रदेश की राजनीति में गहरी पैठ है। उनका जाटलैंड की सीटों पर गहरा प्रभाव है। पिछले विधानसभा में दोनों ने अलग अलग चुनाव लड़ा था फिर भी ये सीटें बीजेपी के खाते में जाती नज़र नहीं आई। इन दोनों सीटों पर लगभग जाट नेताओ का ही कब्जा रहा। इस बार आसार ये बन रहे है की ये की ये दो जाट नेता एक साथ आ सकते है तो प्रदेश में बीजेपी की लहर भी रुक सकती है और सरकार बनाने में रोड़ा भी अटका सकते है।

अब आपको वर्ष 2014 के विधान सभा के चुनाव परिणाम की तरफ ले चलते है जहाँ बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। उन विधानसभाओं में पेहोवा, कलायत, कैथल, समालखा, गन्नौर, राई, खरखौदा, गोहाना, बरोडा, जुलाना, सफीदों, जींद, नरवाना, फतेहाबाद, रतिया, कालावाली, डबवाली, रानिया, सिरसा, ऐलनाबाद, आदमपुर, उकलाना, हांसी, बरवाला, नलवा, लोहारू, दादरी, तोशाम, महम, गढ़ी सांपला किलोई, कलानौर, झज्जर, बेरी, नूह, फिरोजपुर झिरका, पुन्हाना, हथीन, होडल, पलवल, पर्थला, फरीदाबाद NIT, तिगांव शामिल है। अगर गौर किया जाए तो इनमे से नूह जिले के अंतर्गत आने वाली विधानसभा छोड़ भी दी जाए तो सभी विधानसभा जाट वोट बैंक से भरी हुई है। वर्ष 2014 में भी बीजेपी को इन सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था और ये सीटें इस बार बीजेपी का 75 पार का सपना चकनाचूर कर सकती है।

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